मंडला जिले के धनवाही गांव की किसान प्रभा तेकाम ने प्राकृतिक खेती के जरिए अपनी वार्षिक शुद्ध आय करीब दोगुनी कर ली है। तीन एकड़ भूमि की स्वामिनी प्रभा ने लगभग पांच वर्ष पहले दो एकड़ खेत में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल छोड़ दिया था।

घर पर तैयार किए प्राकृतिक कृषि आदान

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन और आत्मा योजना से मिले प्रशिक्षण व मार्गदर्शन के बाद प्रभा ने जीवामृत, बीजामृत, घनजीवामृत और नीमास्त्र बनाना सीखा। उन्होंने घर पर बायो इनपुट रिसोर्स सेंटर और जीवामृत इकाई भी स्थापित की, जिससे बाजार से कृषि आदान खरीदने पर निर्भरता कम हुई।

प्रभा धान, मक्का, अरहर, कोदो-कुटकी, गेहूं, चना, मटर और सब्जियों की खेती कर रही हैं। फसल विविधीकरण से खेती को वर्षभर आय का साधन बनाया गया है, जबकि पारंपरिक बीजों के संरक्षण के साथ पराली और दूसरे कृषि अवशेषों का भी खेत में उपयोग हो रहा है।

आय बढ़ी, मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार

प्राकृतिक खेती अपनाने से उनकी वार्षिक शुद्ध आय करीब 30 हजार रुपये से बढ़कर 60 हजार रुपये हो गई। कृषि लागत में करीब 60 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है।

मृदा परीक्षण में खेत के जैविक कार्बन और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार देखा गया। सीमित संसाधनों वाली खेती में घर पर तैयार कृषि आदानों और अलग-अलग फसलों के संयोजन ने उनकी बाजार पर निर्भरता घटाई है।

दूसरी महिलाओं तक पहुंचा रहीं सीख

प्रभा ने आठ प्रशिक्षण और एक्सपोजर विजिट से मिले ज्ञान को गांव की अन्य महिलाओं और किसानों के साथ साझा किया है। स्व-सहायता समूह और किसान उत्पादक संगठन से जुड़कर वह उन्हें प्राकृतिक खेती तथा आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित कर रही हैं।